लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में
जहाँ वर्षों से मेरे इंतज़ार में खड़ा है एक खंडहरनुमा घर
अपनी खिड़कियों में कुछ बेचैन आँखों को टाँके हुए
अपनी दरकती दीवारों में टूटने का सबब सँभाले हुए
लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में
मैं लौट जाना चाहता हूँ फिर से उसी घर में
जिसके अहाते में चावल चुन रही एक बूढ़ी औरत
चौंकती है कौवों की काँव-काँव पर
उसे अभी भी यक़ीन होगा इस कहावत पर कि
“सुबह का भूला लौटता है शाम को”
और इसी लिए हर शाम
दिया रख जाती होगी दरवाज़े पर
मैं लौट जाना चाहता हूँ उसी घर में
जिसके कमरे में एक बूढ़ा
अख़बार में ढूँढ रहा होगा
गुमशुदा लोगों की फ़ेहरिस्त में किसी का नाम
और ख़ुद को दे रहा होगा तसल्ली कि
दुनिया के किसी कोने में
जल ही रहा होगा
उसके घर का चिराग
अरहान
Leave a Reply