रोटी

उस समय आंदोलन नाम की हवा बह रही थी 
जब वो औरत चूल्हे की भडकती आग पर रोटियां सेंक रही थी 
रह रह कर पार्श्व में सुनती थी लोगो के मूह से 
किसी आचार के मिटाने के बारे में किये गए नारे 
पर उसका सारा ध्यान रोटी पर था और पोटली में रखे गए आचार पर 
जो वो अपने बच्चे को खिलाने वाली थी 
उसके चेहरे पर आया था दुनिया फतह करने जैसा भाव 
जब उसने अपने बच्चे को रोटी थमाई 
बच्चा रोटी लेकर खेलने लगा 
उस बच्चे की तरह के बच्चों को खिलौना नहीं मिलता
इसलिए वो खेलते हैं हाथ में आयी किसी भी चीज से
बच्चा रोटी को दूरबीन बना कर खलेने लगा
शायद वो अपनी माँ को दिखाना चाहता था की
वो उसकी एक रोटी से ही अपनी सारी जरूरतें पूरी कर सकता है
उसकी माँ उसे प्यार से डांटती है
“रोटी खेलने की चीज नहीं”
पर बच्चा गैलीलियो बन चूका था
वो उस रोटी की दूरबीन से वो सब कुछ देखना चाहता था
जो वो रोज चाहर भी नहीं देख पाता
पर बच्चे को उस दूरबीन से दिखाई देते हैं
बड़ी बड़ी गाड़ियों में उसकी तरफ आते कुछ लोग
शायद उसकी रोटी छिनने वाले लोग
बच्चा झट से रोटी खा लेता है
पसर जाती है एक ख़ामोशी थोड़ी देर के लिए
उसके माँ और उसके बीच
जिसे अगले ही पल तोड़ देती है
भीड़ से उठती एक नारे की आवाज
“गरीबो की रोटी मत छीनो”

अरहान 

One response to “रोटी”

  1. Very nice.

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