बोरवेल में सच का गिरना

दुनिया कह रही थी
“बोरवेल में बच्चा गिरा है”
दुनिया अपने हाथ कमीज में छिपा कर कह रही थी
“हमारे हाथ कटे है”
दुनिया चिल्ला चिल्ला कर उस से कह रही थी
“उतरो नीचे, तुम्हारे पास कमीज नहीं”
“तुम्हारे हाथ दीखते हैं”
वो दुनिया से नही डरता था
दुनिया की परवाह नही थी
पर बच्चे के बारे में सोच कर उतरा
उसे सच्चाई पसंद थी
गहराई पसंद थी
उसे अँधेरे में रौशनी की तलाश पसंद थी
वो उतरा
बोरवेल में उतरता गया
उसे कोई बच्चा ना मिला
पर गहराई में उतरने पर उसे सच्चाई मिली
वो सोचा
दुनिया को गलतफहमी हुयी है
“कोई बच्चा नहीं गिरा है बोरवेल में”
“हाँ पर सच्चाई जरूर दफ़न है इस बोरवेल में”
वो नीचे से चिल्लाया
“यहां कोई बच्चा नहीं है”
वो चिल्लाता रहा
“यहाँ कोई बच्चा नहीं है”
उसकी आवाज टकराती और लौट आती
थक कर जब वो चुप हुआ तो,
उसे दुनिया के चिल्लाने की एक धीमी आवाज सुनाई दी
“बोरवेल में शराबी गिरा है”

2 responses to “बोरवेल में सच का गिरना”

  1. बढ़िया लिखा है👌

  2. क़लम को चरण स्पर्श।

Leave a Reply

Discover more from अरहान Arahaan

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading