मशीन

बाहर एक अंधाधुंध दौड़ चल रही है. बड़ी बड़ी कंपनियों ने एमेनिटीज फैसिलिटीज के नाम पर हमारे पैरों में इंजन बाँध दिए हैं. हम दौड़ते हैं, दुगनी रफ़्तार से दौड़ते हैं. सुबह घर से निकलते हैं और शाम तक घर से इतनी दूर चले जाते हैं की दुबारा घर लौटना मुश्किल हो जाता है. हम हर रोज घर बदलते है. हम हर रोज खुद को बदलते हैं. हम दौड़ते हैं, क्यूंकि हमें दौड़ना है. हमसे एक कागज़ पर लिखवाया गया है की हम दौड़ेंगे और भटकने से नहीं घबराएंगे. पर सच तो यह है की हम घबराते है फिर भी दौड़ते हैं. हम दौड़ते हैं हर वक्त दौड़ते हैं. सोते समय हमारे पैर आँखों में लगा दिए जाते हैं. हम अपने सपनों में भी दौड़ते हैं. सपनों में थक कर गिरने के बाद हम फिर असल दुनिया में दौड़ते हैं.

मैं भी दौड़ता हूँ, हर रोज दौड़ता हूँ. पर एक दिन मैं रुक जाना चाहूंगा. एक दिन जब सब भाग रहें होंगे तो मैं चुपके से अपने पर्स से तुम्हारी एक तस्वीर निकालूँगा. हाँ वही तस्वीर जिसमे तुमने मेरी आँखों को आईना बनाकर अपने माथे पर वो लाल बिंदी लगाई थी. तुम्हारी तस्वीर भले ही धुंधली हो गयी हो, पर तुम्हारे माथे की बिंदी अब भी लाल है. सुर्ख चटख लाल. इतनी लाल की वो मुझे किसी भी रेस, किसी भी दौड़ में रोक सकती हैं. मैं उस दिन रुकुंगा और हमेशा के लिए उस लाल बिंदी के नीचे एक छोटी सी रेखा, एक लाइन बनकर सो जाउंगा.

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