मादूम शहर की इमारतें

इस दुनिया के सभी लोग मारे जा चुके हैं। सिर्फ मैं ज़िंदा हूँ। इस पूरी दुनिया में सिर्फ मैं ज़िंदा बचा हूँ। मैं इस बात से परेशान या हैरत में नहीं की दुनिया के सारे लोग मारे जा चुके हैं, हैरत इस बात की है की मैं ज़िंदा हूँ। क्यों ज़िंदा हूँ? मुझे नहीं पता। पर हाँ इतना पता है की मैं ज़िंदा हूँ।

मैं अभी एक सड़क पर खड़ा हूँ। सड़क के दोनों ओर बड़ी बड़ी इमारतें है। उन इमारतों में खिड़कियाँ नहीं है, दरवाजें नहीं है। इन इमारतों में खिड़कियों और दरवाजों की जगह जगह बड़े बड़े स्क्रीन लगे हुए हैं। इन स्क्रीन्स में उन लोगो की चलती तस्वीरें है जिन्हे मैं जानता हूँ। वो तमाम लोग है जिन्हे मैं मिला था। वो लोग भी जिनको पल भर के लिए भी कहीं देखा था। वो बूढी औरत भी है इन्ही किसी स्क्रीन में जो घंटो अपने घर की बालकनी में बैठी स्वेटर बुना करती थी। वो इस स्क्रीन में अब भी स्वेटर ही बुन रही है। उसके हाथों में दो बड़े बड़े कांटें हैं, उन की जगह उसके हाथों रेल की पटरियां हैं। वो रेल की पटरियों से स्वेटर बन रही है। मुझे पूरा यकीं है जिस दिन भी उसका स्वेटर पूरा होगा वो इस स्क्रीन से गायब हो जाएगी। किसी और दुनिया में जहाँ इसी तरह हजारों स्क्रीन होंगे। जहाँ मारे जा चुके होंगे सारे लोग। जहाँ ज़िंदा होगा एक लड़का सड़क पर खड़ा उसे घूरते हुए।

यहाँ एक स्क्रीन पर वो भी है। वो शायद कोई किताब लिख रही है। किताब लिखने के लिए कलम और कागज़ की जरुरत ऐसा हर बार जरुरी नहीं। वो अपने हाथों से अपने बाल पकडे हुए है। उसने अपने होठों पे एक हेयर क्लिप फंसा रक्खा है। वो अपने चेहरे पर बेचैनी की एक किताब लिख रही है। उसके चेहरे की किताब पे मैंने एक शब्द पढ़ा है। इन्तजार। ये एक बहुत ही लंबा शब्द है। इस शब्द को पढ़ने के लिए मुझे घंटो खड़े होकर उसके चेहरे को देखना होगा। मैं एक दफा अपनी पैर की तरफ देखता हूँ। मेरे पास पैर नहीं है। मेरे पास पैरों की जगह शराब की भरी बोतल हैं। मैं उन्ही के बल पे खड़ा हूँ। मैं नशे में नहीं हूँ। मेरे कदम नशे में धुत है। शायद इसलिए मैं नहीं पढ़ पा रहा हूँ इन्तजार नमक ये शब्द। ये जो इतंजार शब्द है इसे पढ़ने के लिए आँखें नहीं पैर चाहिए। मेरे पैर! मेरे पैर कहाँ है!

मैं अभी बहुत परेशान हूँ। मेरे पास पैर नहीं है। मेरे पास आँखें है। आँखों से मैं इन्तजार शब्द नहीं पढ़ सकता। पर मेरी आँखें इन इमारतों से चिपकी स्क्रीन्स देख सकती है। यहाँ एक और स्क्रीन है जिसमे मैं हूँ। स्क्रीन वाले में जो मैं है उसके पास पैर है। वो भाग रहा है। वो बहुत जोर से भाग रहा है। उसके पीछे एक बहुत बड़ी सी भीड़ है। ऐसी भीड़ जिनकी आँखें उनके पैरों में है। उनके आँखों की जगह आँख जैसा कुछ नहीं है। उनके आँखों की जगह वाली जगह पर ज्वालामुखी है। उन ज्वालामुखियों से लावा फुट रहा है। वो लोग हंस रहे हैं। वो लोग स्क्रीन वाले मैं के पीछे दौड़ रहे हैं। उन लोगो की भीड़ में वो बूढी औरत भी है। उन लोगो की भीड़ में तुम भी हो। उन लोगो की भीड़ में वो सब है जिन्हे मैं जानता हूँ। उस स्क्रीन में जो मैं हूँ वो दौड़ रहा है। उसकी रफ़्तार इतनी तेज है की उसके पैर उखड रहे है। वो अब गिर रहा है। ऐसा लग रहा है की अब वो स्क्रीन से बहार आ जायेगा। वो अब स्क्रीन से बाहर आ गया है। अब वो मेरे सामने खड़ा है। मेरे सामने एक और मैं खड़ा है। ये मुझे एक आईना दिखा रहा है। इस आईने में मेरे ठीक पीछे की एक तस्वीर उभरी है। जिसमे मैं हूँ। एक नहीं दो नहीं तीन नहीं। हजारों मैं। इन इमारतों पे चिपकी स्क्रीन्स से गिरते हुए।

Leave a Reply

Discover more from अरहान Arahaan

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading