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हम दोनों में प्रेम एकाएक इसलिए पनप गया था क्यूंकि हम दोनों की आदतें एकदूसरे से मिलती थी। हम दोनों ही कहानियां लिखते थे। एक ही राइटर के फैन थे। बाकी लोगों की तरह हम सिनेमा हॉल के कोने वाली सीट पर बैठकर कोई मसाला बॉलीवुड फिल्म नही देखना पसंद करते थे। हम दोनों घंटो घर के सोफे पर बैठ आर्ट फ़िल्में देखा करते थे। दुनिया के तमाम चित्रकारों के चित्रों पर चर्चा करते थे। हम जिस मुद्दे पर बात करते उसमें एक बात हमेशा सामान्य रहती की उसके जो विचार होते थे वो मेरे विचारों से मेल खाते थें। अंग्रेजी में एक शब्द है सेपिओसेक्सुअल, हमारे रिश्ते की नीव इसी शब्द ने रखी थी।
हम दोनों में कभी कोई वैचारिक मतभेद नही रहा। मुझे उसकी सभी कहानियां पसंद आती और उसे मेरी सारी कहानियां। हम दोनों के बीच सबकुछ अच्छा चल रहा था। वो अपने किताब पर काम कर रही थी और मैं अपने किताब पर। खाली समय में हम दोनों अपने-अपने किरदारों के जीवन पर बाते करते। सबकुछ अच्छा चल रहा था। सब कुछ बढ़िया चल रहा था। सबकुछ अच्छा चलने की क्रिया अपने पीछे में कुछ खराब होने की आशंका को छिपा कर चलती है। हमारी जिंदगी में भी ऐसा हुआ।
एक दिन बहुत छोटी से बात हुई। मैंने उसकी हाथ में एक किताब देखी। एक बहुत ही पॉपुलर लेकिन दोयम दर्जे की किताब। मैं उस से उस किताब के बारे में कुछ पूछता उस से पहले ही उसने अपने होठों पर एक सिगरेट जलाते हुए कहा
“ये किताब पढ़ना, बेहतरीन है, क्या लिखता है ये आदमी। पहली बार मैंने ऐसी किताब पढ़ी जो बेहद सुलझी हुई लगी। एक प्यारी से कहानी बिना किसी दोहरी बात के। बिना किसी पहली के। तुम भी पढो। ये लेखक बहुत पॉपुलर भी है। सोशल मीडिया पर इसके लाखो चाहने वाले भी हैं।”
आमतौर पर किसी सामान्य आदमी के लिए ये बात कोई बड़ी बात नही होती। पर मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी। मैं ये बात बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था की वो लड़की जो मुझसे प्यार करती है, मैं जिससे प्यार करता हूँ वो ऐसे लेखक की ऐसी किताब को कैसे पसंद कर सकती है। मुझे उस लेखक से ज्यादा परेशानी नही थी लेकिन मैं उसे टुच्चा लेखक मानता था। मैं उसे लेखक मानता ही नहीं था मैं बस उसे एक व्यापारी समझता था जो अपनी लिजलिजी भावनाओं के जाल में भोले-भाले पाठकों को फंसाकर अपनी जेबें गर्म करता था।
उस दिन मैंने उसे ज्यादा कुछ नही कहा लेकिन उस दिन से हम दोनों के बीच पहले जैसा कुछ न रहा। उसकी पसंद धीरे-धीरे बदलने लगी। उसकी किताबों की आलमारी में दुनिया भर के टुच्चे किताब भरे जाने लगें। उसके गाने सुनने का स्वाद भी बदलने लगा। वो अब जब घर आती तो किसी बॉलीवुड मसाला फिल्म की कोई डीवीडी लेकर आती। पहले एक समय में हम दोनों साथ-साथ शास्त्रीय संगीत सुनते। हिंदी और अंगेजी में जितने भी क्लासिकल गीत थे हमने सुन रखे थे। हम दोनों ये गाने सुनते-सुनते, गाने की धुन पर एक कहानी बुनते। उस कहानी में मौजूद शहर की गलियों में हम देर तक हाथों में हाथ डाले उस शहर के आसमान पर उगे चाँद को देखते। वो वक्त बहुत हसीन होता। वो ऐसा वक्त होता था जब हम इस दुनिया में नहीं होते थे। वो हमारी अलग दुनिया होती जहाँ के पेड़-पौधे, सड़कें, जानवर, इंसान सभी हमारे होते। वो मुझसे कहती की तूम कभी गुमशुदा हुए तो मैं तुम्हें इन्हीं गानों के किसी विडियो में ढूंढ लूंगी। तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें वापिस अपनी दुनिया में ले आऊंगी।
मैंने उसे अपने बारे में सबकुछ बताया था। बस एक बात छिपाई थी की मैं कभी अकेले में इन्टरनेट पर विदेशी भाषाओँ के गाने सुनता था। अरबी, तुर्की, अजेरी, इरानी, पश्तो इस तरह की उन तमाम भाषाओं के गाने सुनता था जिनके बोल मैं समझ नही पाता था लेकिन उन गानों की धुनों को समझता था। इन गानों को सुनकर मुझे इन बातों की ख़ुशी मिलती की मुझे जानने वाला कोई भी इंसान इन गानों को नहीं सुनता होगा। वो इनके बारे में नहीं जानता होगा। मुझे ख़ुशी होती की ये गाने मेंरे हैं। इन गानों की धुनों पर मैंने जो भी कहानियां बुनी है वो मेरी हैं। इन गाने के वीडियोज में जो मुख्य किरदार है वो मैं हूँ।
उसके उस लेखक की किताब पढने के हफ्ते के बाद मैं एक दिन लापता हो गया। उसने मुझे हम दोनों के पसंद के जितने भी गाने थे, जितनी भी कहानियां जितने भी नाटक थे उसमें उसने मुझे ढूंढा। पर मैं कहीं भी न मिला। मिलता भी कैसे। मैं एक तुर्की गाने के एक विडियो में किसी दूकान पर लूप में टर्किश काफी बेचने लगा था। मुझे उम्मीद थी की मुझे जानने वाला कोई भी शख्स तुर्की के इस छोटे से शहर के इस चौराहे पर मुझे तुर्की में बात करते, तुर्किश काफी बेचते ढूंढ पायेगा। खासकर वो जो अब किसी पंजाबी पॉप गाने में हाई हील पहने किसी दाढ़ी वाले बन्दे के साथ मर्सिडीज ऑडी जैसे गाड़ियों में घूम रही होगी।
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