Best Pakistani Movie: बात जब पाकिस्तानी फ़िल्मों की आती है तब हमारे ज़ेहन में गिने-चुने नाम ही आटे हैं जैसे ‘बोल’, ‘रामचन्द पाकिस्तानी’, ‘खुदा के लिए’, ‘वार’, ‘मौला जट’ या ‘मैं शाहिद अफरीदी’। अगर कोई ज्यादा ही फ़िल्मों का शौकीन हो तो वो शायद कुछ और मसाला फ़िल्मों के नाम बता दे जैसे ‘ना मालूम अफ़राद’, ‘जवानी फिर नहीं आनी’ या फिर अली ज़फ़र की ‘तीफ़ा इन ट्रबल’। भारतीय दर्शकों के बीच यही कुछ पाकिस्तानी फ़िल्में हैं जो थोड़ी लोकप्रिय हैं। इनमें से कुछ फ़िल्में वैश्विक स्तर पर भी काफी लोकप्रिय हुई थीं।
इन फ़िल्मों की फेहरिस्त से इतर एक और फ़िल्म आई है जो भारतीय दर्शकों के बीच थोड़ी बहुत लोकप्रिय हुई है। इस फ़िल्म के बारे में मुझे भी हाल में ही पता चला था और जब मैंने यह फ़िल्म देखी तो मुझे लगा की इस फ़िल्म के बारे में और लोगों को भी पता होना चाहिए। इस फ़िल्म का नाम है ‘लाल कबूतर’। यूट्यूब पर मुफ़्त उपलब्ध इस फ़िल्म को हम और आप बिना किसी शुल्क के बस अपना समय खर्च करके देख सकते हैं। मेरी मानिए तो इस फ़िल्म पर खर्च किया गया समय ज़ाया नहीं जाएगा।
फ़िल्म की कहानी
फ़िल्म की शुरुआत दिन-दहाड़े की गई एक हत्या से होती है। हत्या एक पत्रकार की जो शायद एक बहुत बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा करने के करीब था। पाकिस्तान की लाचार पुलिस व्यवस्था इस कत्ल के तह तक नहीं जा पाती तब फौत (मृत) हुए शख्स की बेगम उसके कातिल तक पहुँचने का जिम्मा उठाती है। इसके बाद फिर दृश्य में आता है पाकिस्तान का पितृसत्तात्मक समाज जिसे यह गवारा नहीं होता कि कैसे एक अकेली बेवा औरत अपने शौहर के कातिलों का पता लगा सकती है।
फ़िल्म के किरदार
फ़िल्म में एक और मज़बूत किरदार है, अदील। अदील एक टैक्सी ड्राइवर है जो ओला-उबर सरीखे पाकिस्तान की एक टैक्सी कंपनी में किराये पर गाड़ी चलाता है। अदील एक अच्छा जीवन जीने के लिए दुबई जाने का सपना देखा करता है। लेकिन, जैसे हर मध्यम या निम्न मध्यम वर्गीय व्यक्ति के सपनों के आड़े पैसा आता है ठीक वैसे ही अदील के दुबई जाने के बीच मुफलिसी की एक खाई होती है जिसे सिर्फ पैसो से बना पुल ही रास्ता दे सकता है। अदील को अपना सपना पूरा करने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है और उसके लिए वो अपने दो साथियों के साथ मिलकर अपने टैक्सी के ग्राहकों को उनके हैसियत के अनुसार लूटपाट करवाता है और बाद में अपने हिस्से के पैसे ले लेता है।
इसी कड़ी में एक बार अदील का सामना आलिया से होता है। आलिया जिसके पति नोमन मलिक की हत्या हुई होती है। सयोंग वश आलिया उसी गाड़ी को हायर करती है जिसका ड्राइवर अदील होता है। इस टैक्सी से शुरू हुई इनदोनों की यह यात्रा बाद में आपस में जुड़ जाती हैं। फ़िल्म की कहानी कातिल का पता लगने और उसे सजा दिलाने के साथ खत्म हो जाती है।
फ़िल्म से जुड़ी कुछ रोचक बातें
इस फ़िल्म में एक नई चीज़ देखने को मिली जो अमूमन बाकी पाकिस्तानी फ़िल्मों में देखने को नहीं मिलती। फ़िल्म में पुलिस की भूमिका में एक हिन्दू किरदार भी था। जैसे कई बॉलीवुड फिल्मों में देखा जाता है कि समाज का एक बेहतर समीकरण बनाने के लिए मुस्लिम किरदारों को फ़िल्मों में शामिल किया जाता है वैसा ही फ़िल्म में भी किया गया है। कहानी चूंकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के कराची शहर की थी जहां अच्छी खासी हिन्दू आबादी है तो शायद यह बात पाकिस्तान के लिए सामान्य हो पर आमतौर पर एक भारतीय दर्शक के लिए यह थोड़ा चौंकाने वाला है।
एक हिन्दू किरदार के अलावा एक और किरदार था जो ईसाई था। सोनू नाम के इस किरदार के गले में एक क्रॉस लटका हुआ होता है जिससे यह पता चलता है की वह ईसाई है। यह बहुत मामूली बातें हैं लेकिन इनका ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इस फ़िल्म में जाने अनजाने में इस पहलू को दिखाया गया है कि पाकिस्तान जैसे इस्लामिक मुल्क में भी अल्पसंख्यकों का एक वजूद है और कुछ अतिवादी लोगों को नज़रअंदाज किया जाए तो बाकी लोगों की नज़र में यह अल्पसंख्यक भी समान हैं।
बात अगर फ़िल्म के छायांकन, पटकथा, संवाद या किरदारों के अभिनय की हो तो कहा जा सकता है कि इस फ़िल्म में बेहतरीन काम हुआ है। फ़िल्म की कलर ग्रेडिंग भी बेहद शानदार है। फ़िल्म देखने के बाद यह भी पता चलता है कि कराची भी बिल्कुल बाकी भारतीय शहरों जैसा ही है और दोनों जगहों में कमोबेश भ्रष्टाचार वाला बराबर ही है।
उर्दू भारत की ही भाषा है। हमारे दैनिक बोलचाल की भाषा में उर्दू जिस तरह से रच बस गयी है उसे हटाना अब थोड़ा मुश्किल है। बॉलीवुड फ़िल्मों के गानों और संवादों में हमने इतने सारे उर्दू या फिर कहें अरबी या फारसी मूल के शब्द सीख लिए हैं जिसका कोई हिसाब नहीं है। पाकिस्तान, जहां अब भी ज़्यादातर लोग पंजाबी, पश्तो, सिन्धी या सराईकी जुबान में बात करते हैं वहाँ उर्दू एक थोपी गई भाषा है। फ़िल्म में जब एकबारगी एक किरदार उर्दू के बीच में एक शुद्ध हिंदी शब्द ‘कष्ट’ का उपयोग करता है तब थोड़ा आश्चर्य होता है।
फ़िल्म देखने लायक है। इस फ़िल्म से जुड़ी एक रोचक बात यह है कि पाकिस्तान सरकार ने इस फ़िल्म को अपने देश की तरफ से ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेज था।
-ब्रजेश कुमार सिंह (अरहान)

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