कुछ समय पहले मैंने What I Talk About When I Talk About Running’ किताब में हारुकी मुराकामी के लेखक बनने की कहानी पढ़ी थी।
चूँकि मैं खुद लिखता हूँ और आगे जाकर एक लेखक बनना चाहता हूँ इसलिए मैं इस किताब को पढ़कर और मुराकामी के लेखक बनने की यात्रा को जानकार काफी प्रेरित हुआ। इसी किताब से जुड़ एक किस्सा मैं यहाँ मुराकामी के अंदाज और शब्दों में साझा कर रहा हूँ।
एक बेसबॉल मैच, जैज़ और खाली सड़कें

सुबह का वक़्त है। खिड़की से हल्की रोशनी छनकर आ रही है और कमरे में एक खामोशी है। रिकॉर्ड प्लेयर पर बिल इवांस का पियानो बज रहा है, उसकी धुन हवा में घुल रही है, ठीक वैसे ही जैसे सुबह की पहली कॉफ़ी की भाप। लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि मैं क्यों लिखता हूँ। इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। जवाब हमेशा घुमावदार रास्तों से होकर आता है, जैसे कोई पुरानी याद।
यह बात 1978 की है। अप्रैल का एक खूबसूरत, खुला-खुला दिन था। मैं टोक्यो के जिंगू स्टेडियम में घास पर लेटा हुआ, बीयर पीता हुआ एक बेसबॉल मैच देख रहा था। याकुल्ट स्वैलोज (Yakult Swallows) और हिरोशिमा कार्प (Hiroshima Carp) के बीच का मैच। उस वक़्त तक मेरे मन में लेखक बनने का कोई दूर-दूर तक ख्याल नहीं था। मैं और मेरी पत्नी, योको, एक छोटा सा जैज़ क्लब चलाते थे – ‘पीटर कैट’। हमारी ज़िंदगी कर्ज़ चुकाने, सुबह से देर रात तक काम करने, कॉकटेल बनाने और जैज़ सुनने में ही कट रही थी।

मैच चल रहा था। डेव हिल्टन, जो एक अमेरिकन खिलाड़ी थे, बैटिंग करने आए। उन्होंने बल्ले को घुमाया और एक बेहतरीन डबल मारा। गेंद और बल्ले के टकराने की वह साफ़, सुरीली आवाज़ पूरे स्टेडियम में गूंज गई।
और उसी पल… ठीक उसी एक क्षण में, जैसे आसमान से कोई आवाज़ आई हो, मेरे मन में एक ख्याल कौंधा – “मैं एक नॉवेल लिख सकता हूँ।”
यह कोई सोची-समझी बात नहीं थी। कोई तैयारी नहीं थी। बस एक अहसास था, साफ़ और पक्का। उस दिन घर लौटकर मैंने एक फाउंटेन पेन और कुछ कागज़ खरीदे। हर रात, जब क्लब बंद हो जाता था, मैं किचन की टेबल पर बैठकर लिखने लगा। उस पहली नॉवेल का नाम था – हियर द विंड सिंग (Hear the Wind Sing)।
जब मैंने लिखने को ही अपना पेशा बनाने का फैसला किया और जैज़ क्लब बेच दिया तो एक नई समस्या सामने आई। घंटों तक एक डेस्क पर अकेले बैठे रहने के लिए जिस शारीरिक और मानसिक मज़बूती की ज़रूरत थी, वह मेरे पास नहीं थी। मेरा वज़न बढ़ने लगा था और मैं आसानी से थक जाता था।
इसका हल मुझे दौड़ने में मिला।

मैंने दौड़ना शुरू किया, ठीक उसी तरह जैसे मैंने लिखना शुरू किया था बिना किसी खास वजह के, बस मुझे एक ज़रूरत महसूस हुई।
सुबह उठना, जूते पहनना और शहर की खाली सड़कों पर निकल जाना। शुरू में यह मुश्किल था, शरीर दर्द करता था, साँसें उखड़ जाती थीं। लेकिन धीरे-धीरे, मेरा शरीर इसका आदी हो गया।
दौड़ना और लिखना, मेरे लिए एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए। दोनों ही अकेले किया जाने वाला काम है। दोनों में अनुशासन चाहिए।
जब मैं दौड़ता हूँ, तो मैं किसी से मुकाबला नहीं कर रहा होता। मैं बस एक तय दूरी को, एक तय समय में पूरा करने की कोशिश कर रहा होता हूँ।

मैं अपने अंदर की आवाज़ें सुनता हूँ, या कभी-कभी अपने मन को बिल्कुल खाली कर देता हूँ। उस खालीपन में ही नए विचार जन्म लेते हैं, कहानियों के उलझे धागे सुलझते हैं।
लोग मैराथन दौड़ने को एक दर्दनाक और जटिल अनुभव मानते हैं। हाँ, यह दर्दनाक है। लेकिन उस दर्द को सहने की प्रक्रिया में ही आप खुद को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं।
आप अपनी सीमाओं को जानते हैं और फिर उन्हें पार करने की कोशिश करते हैं। लिखना भी कुछ ऐसा ही होता है। आपको अपने अंदर की गहराई में उतरना पड़ता है, जेहन में बसे जगहों की सैर करनी होती है जहाँ आप आमतौर पर जाने से डरते हैं।
आज भी, हर सुबह मैं मीलों दौड़ता हूँ। यह मेरे रोज़मर्रा का हिस्सा है, मेरी पहचान है। शरीर को थकाना, ताकि मन शांत होकर अपनी गहराई में उतर सके।

कभी-कभी मैं सोचता हूँ, अगर उस दिन डेव हिल्टन ने वह डबल न मारा होता, तो क्या होता? शायद मैं आज भी किसी कोने में एक जैज़ क्लब चला रहा होता, कॉकटेल बना रहा होता और दूसरों की लिखी किताबें पढ़ रहा होता।
शायद ज़िंदगी ऐसे ही अजीब पलों का एक सिलसिला है। एक बेसबॉल का हिट, एक जैज़ की धुन, और एक खाली सड़क… बस इतना ही काफी है सब कुछ बदलने के लिए। और मेरी बिल्ली, वह हमेशा की तरह मेरे पैरों से लिपट जाती है, जैसे कह रही हो, अब सोचने का वक़्त खत्म हुआ।
सारी तस्वीर कृत्रिम प्रज्ञा के माध्यम से बनाई गयी है और मौलिक न होते हुए भी मौलिक है.
अरहान (ब्रजेश कुमार सिंह)

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