शाम का वक्त था। मैं खिड़की के पास खड़ा हो गया। बाहर हल्की बारिश टपक रही थी। छत पर छोटी-छोटी आवाजें पड़ रही थीं। मैंने कॉफी बनाई। काली, बिना चीनी के। भाप पतली लकीरों में ऊपर उठती रही। फिर सोफे पर बैठ गया और फिल्म चला दी। नाम था The Killing of a Sacred Deer।
स्क्रीन पर डॉ. स्टीवन मर्फी का संसार धीरे-धीरे खुलने लगा। एक सफल सर्जन। हाथों में जिंदगियाँ संवरती हैं लेकिन चेहरा हमेशा शांत रहता है। उनका घर भी बिल्कुल वैसा ही था। हर चीज अपनी जगह पर। हर कोना साफ। जैसे ऑपरेशन थिएटर की ट्रे पर रखे सामान। पत्नी अन्ना नेत्र चिकित्सक हैं। दो बच्चे, बेटा बॉब और बेटी किम। नाश्ते की मेज पर बातें भी एक खास लय में चलती थीं। रात का खाना, स्कूल की बातें, छोटी मुस्कानें। सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था।
लेकिन फिर मार्टिन आया।
एक किशोर। आँखें शांत लेकिन देखने का अंदाज कुछ अलग। उसका पिता सालों पहले स्टीवन के ऑपरेशन के दौरान नहीं रहा। मार्टिन धीरे-धीरे करीब आने लगा। पहले बातें, फिर घर आना जाना। परिवार उसे स्वीकार करने लगा। जैसे कोई नया सदस्य जो बिना शोर किए अपनी जगह बना रहा हो।
फिर कुछ बदलने लगा।
बच्चों में एक अजीब सी बीमारी के लक्षण दिखने लगे। पैरों में ताकत चली गई। भूख मिट गई। कोई नाम नहीं उसका। कोई रिपोर्ट कुछ नहीं बता पाती। स्टीवन जो हमेशा इलाज जानता था, अब सिर्फ देखता रहता है। तर्क की दुनिया में दरार पड़ने लगती है। और उस दरार से कुछ पुराना सा रिसता हुआ आता है।
यॉर्गोस लैंथिमोस ने इस कहानी को जिस तरह फिल्माया है वह देखते ही देखते मन में बस जाता है। कैमरा बहुत शांत है। चेहरों पर देर तक टिका रहता है। घर की रोशनी ठंडी लगती है। संवाद कम हैं और जो हैं वे सीधे से हैं। लेकिन उन्हीं सीधी बातों के बीच एक तनाव बनता रहता है।
कॉलिन फैरेल स्टीवन के रूप में बहुत अच्छे लगे। एक आदमी जो हमेशा नियंत्रण में रहने का आदी रहा, अब धीरे-धीरे अपने जीवन से फिसलता हुआ। निकोल किडमैन अन्ना में एक ठंडी शांति है जो कभी डरावनी लगती है। बैरी कीओघन का मार्टिन सबसे ज्यादा याद रहता है। वह कम बोलता है लेकिन उसकी मौजूदगी पूरे घर को बदल देती है। जैसे कोई बिल्ली रात में आ गई हो और अब चली नहीं जा रही।
फिल्म में हास्य भी है लेकिन बहुत अजीब सा। हँसी नहीं आती, कुछ और महसूस होता है। दृश्य सुंदर हैं लेकिन उनमें एक ठंडक है।
देखने के बाद कई दिन तक मन में कुछ घूमता रहा। रात को लेटते वक्त वही घर याद आता। वही रसोई। वही मार्टिन जो चुपचाप देखता रहता है।
मुझे लगा जैसे हमारे अपने जीवन में भी कहीं कोई ऐसा दरवाजा खुला पड़ा हो। कोई पुराना कर्ज जो चुपचाप लौट रहा हो।
यह फिल्म हमें कुछ नहीं समझाती। सिर्फ दिखाती है। जीवन कितना नाजुक है। हम जो कुछ भी बनाते हैं वह सब किसी अनजाने धागे से बँधा हो सकता है। अतीत कभी पूरी तरह मिटता नहीं। वह किसी न किसी रूप में वापस आता है और कुछ माँगता है। और जवाब देने के लिए हमारे पास न शब्द काफी होते हैं न हिम्मत।
फिल्म खत्म होने के बाद स्क्रीन कुछ देर खाली रही। या शायद खाली नहीं थी। शायद उसमें अभी भी कुछ चल रहा था। कोई हल्की साँस। कोई दूर की आवाज।
मैंने कप खाली किया। बारिश अभी भी हो रही थी। शहर वही था। लेकिन कुछ देर के लिए सब कुछ थोड़ा अलग सा लग रहा था। जैसे कोई चीज जो पहले नहीं दिख रही थी अब किनारे पर खड़ी हो गई हो।
और शायद यही सबसे बड़ी बात है इस फिल्म की। कि वह हमें एक ऐसी जगह पर छोड़ जाती है जहाँ हम अपने जीवन को थोड़ी देर के लिए नई नजरों से देखने लगते हैं।
अरहान (ब्रजेश कुमार सिंह) हिंदी लेखक हैं। उनकी पहली किताब ‘इतवार का एक दिन’ (2025) Amazon और Flipkart पर उपलब्ध है। उनकी कहानियाँ पढ़ने के लिए arahaanblog.com देखें। Instagram, Facebook और X पर मिलें: @arahaan40

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