दोषी

मैंने तुम्हे भुला दिया है
निकल फेंका है तुमको
अपनी ज़िन्दगी के हर कोने से
अप तुम्हारी खबर नहीं होती है सुर्ख़ियों पर
मेरी ज़िन्दगी के अख़बार में
पर ना जाने क्यूँ कब और कैसे
तुम्हारी यादें
डेरा जमालेती है मेरे सिराहने में
ना जाने कब दोस्ती का लेती हैं मेरे सपनों से
और ना जाने कब आँखों के सामने
उतर आता है तुम्हारा हसीं चेहरा
समझ नहीं आता है की मैं किसे दोषी ठहराऊं
अपने सपनो को
या तुम्हारी यादों को

अरहान 

One response to “दोषी”

  1. आदरणीय लेखक जी ,
    आपकी कविताओं ,कहानियों से मुझे ऐसा आभास होता है, कि
    जो इंसान हमेशा से अकेला मतलब महा सिंगल रहा हो ,वो भी अपनी पुरानी-प्रेमिका या प्रेमी को याद करने की😂 कोशिश करें और रो दे।,
    नायाब़ ,बेहतरीन। 👌

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