हम लोग गुमशुदा कैसे और क्यूँ हो जाते हैं। क्या उस लड़की को इस बात का फ़र्क़ पड़ रहा होगा की मैं शायद मर रहा हूँ। लड़कियों को क्या किसी बात का फ़र्क़ पड़ता है क्या? क्या उन्हें सच में फ़र्क़ पड़ना चाहिए? मैं अपने सपनों में हमेशा कफ़न ही क्यूँ बनता हूँ? सपनों में तो कई चीज़ें होती हैं। मैं पानी से आधा भरा गिलास क्यूँ नहीं बनता? मैं सपने में अगर पानी से भरा आधा ग्लास बनता तो मैं शायद दो लोगों को इस बात पर बहस करते हुए देखता कि पानी आधा ग्लास भरा है या ख़ाली है। मुझे बहस देखना बहुत पसंद है। तुम्हें बहस करना बहुत पसंद था ना। फिर जब तुम मुझसे बहस करती और मैं तुम्हें बहस करते हुए देखता था, तो हम दोनो ख़ुश क्यूँ नहीं होते थे। मैं उस समय ही ज़्यादा ख़ुश क्यूँ हुआ करता था जब तुम मेरे लिए किचन में चाय बनाने जाती थी।
ब्लैक बोर्ड पर चाक के रगड़ने की आवाज़ सुनी है? कैसी लगती है ये आवाज़? अच्छी तो नहीं ही लगती होगी। किसी को भी ये आवाज़ें अच्छी नहीं लगती है। मुझे भी अच्छी नहीं लगती। मुझे श्रेया घोशाल या तुम्हारी आवाज़ अच्छी लगती है। नहीं, मैं तुम्हारी तुलना श्रेया घोशाल से नहीं कर रहा हूँ। ये तुम भी जानती हो की तुम अच्छा तो गाती हो पर श्रेया घोशाल की तरह नहीं। पर मुझे श्रेया घोशाल से ज़्यादा तुम्हारी आवाज़ अच्छी लगती है। पता है क्यूँ? क्यूँकि तुम्हारी आवाज़ पर मेरा हक़ होता है। मेरे बालों में अंगुलियाँ फिराकर जब तुम मेरे लिए गाती थी तो वो आवाज़ दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत आवाज़ होती थी। तुम्हारी आवाज़ मुझे बस इस वजह से पसंद आती थी क्यूँकि उस आवाज़ पर मेरा हक़ होता था। इस हक़ के लिए ही तो दुनिया की कई सारी लड़ाइयाँ लड़ी गयी हैं। कितने सारे इतिहास इसी हक़ की लड़ाई की वजह से लिखे गए हैं। मुझे कभी-कभी बहुत बुरा लगता है जब मैं ये सोचता हूँ की तुमने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा की ‘तुम लड़े क्यूँ नहीं’।
तुम्हारी आवाज़ पर मेरा हक़ था लेकिन शायद मैंने उस हक़ के लिए कभी लड़ाई नहीं की ना हीं तुमने भी कभी ये पूछा कि मैं लड़ा क्यूँ नहीं। जब मैं अपने हक़ के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ रहा था तब मैं ये सोचता था की खिचड़ी में कितने गिलास पानी होने चाहिए? जवाब में दुनिया के कई सारे तुम्हारे जैसे लोग एक साथ ब्लैकबोर्ड पर चाक से लिखते थे ‘ दो ग्लास आटा गूँथने के लिए पाँच ग्लास पानी मिलाना चाहिए’। मुझसे कभी गोल रोटी नहीं बनी इसलिए मैं बहरा तो हो ही गया साथ ही साथ कभी रोटी नहीं खाई।
मैं सीधे-सीधे अपनी बात क्यूँ नहीं कहता? मैं इतने मेटफ़र में बात क्यूँ करता हूँ। हर बार सीधे-सीधे अपनी बातें बोलने से क्या वो बातें तुरंत मान ली जाती है? मैंने साफ़-साफ़ कहा था तुम्हारे बिना मैं पागल हो जाऊँगा। इस बात का तुमपर कोइ फ़र्क़ पड़ा था क्या? तुम्हें लगा था की मेरी ये बात, दुनिया में बन चुकी कई करोड़ फ़िल्मों में से एक किसी टुच्ची सी फ़िल्म की डायलोग होगी। फ़िल्मों को लोग सीरियसली लेकर प्यार करने लगते थे तो बाद में फिर फ़िल्मों को लोग टुच्चा क्यूँ कहने लगते हैं। ये दुनिया में हर पसंदीदा चीज़ चूइंग ग़म क्यूँ बन जाती है? उस लड़की को इन बातों का फ़र्क़ पड़ता होगा क्या? लोग गुमशुदा क्यूँ हो जाते हैं। मैं सीधे सीधे अपनी बात क्यूँ नहीं कहता? मैं मर क्यूँ रहा हूँ? मुझे तो कोई बीमारी भी नहीं है। कोई बीमारी नहीं है मुझे। क्या लोग सिर्फ़ बीमारियों से ही मरते हैं? हादसे में भी तो लोग मारे जाते हैं? मेरे साथ तो कोई हादसा भी नहीं हुआ है? एक सेकंड! शायद हुआ है। मैं स्योर नहीं हूँ। क्या तुम स्योर थी जब तुमने कहा था ‘आइ वील बी देयर फ़ोर यू’? दुनिया में हर कोई स्योर होता है क्या? लाइफ़ में स्योरिटी गारंटी ना हो बस प्यार हो तो क्या लाइफ़ को हँसते हुए जिया जा सकता है? मैं बस पूछ रहा हूँ? कम पैसे कमाने का एक्सक्यूज नहीं दे रहा। तुम अपनी डायरी में मेरे एक्सक्यूजेज वाले कॉलम में कुछ एड तो नहीं करने लगी न? शायद तुम सुन नहीं रही वरना तुम्हारी क़लम ज़रूर चलती। वैसे भी तुमने सुना भी कब। सॉरी, मुझसे एक ग़लती हो गयी। तुमने एक बार मेरे दिमाग़ में चल रही हॉरर स्टोरी का प्लॉट सुना था। उस हॉरर कहानी में एक अकेला आदमी हर रोज़ आइने से बात किया करता था और एक दिन उस आइने से उसी के जैसा दिखने वाला एक शख़्स निकला और आइने से बात करने वाले आदमी को मारकर उसकी जगह ले ली।
तुम ये कहानी सुनकर उस दिन हँसी नहीं थी ना ही डरी थी। तुमने बस इतना कहा था “कुछ भी”। तुम्हें शुरू से मेरी कहानियाँ या मेरा लिखा हुआ पसंद नहीं था। मैं पसंद था। हो सकता है एक दिन आए जब तुम्हें मैं पसंद ना होऊँ लेकिन मेरा लिखा हुआ पसंद आ जाए। इस हो सकता है वाली बात का आधा हिस्सा पूरा हो चुका है। शायद कभी दूसरा आधा हिस्सा भी पूरा हो जाए । तुम कहती थी मैं सिर्फ़ कहानियों में ज़्यादा सोचता हूँ। असली ज़िंदगी की ज़रूरत वाली चीज़ों पर ध्यान नहीं देता; जैसे सरकारी इग्ज़ैम्ज़ का फ़ॉर्म नहीं भरता, रेजयूमे अपडेट नहीं करता, यूँ ही लिखता हूँ छपवाने की कोशिश नहीं करता। तुम इन बातों पर ज़्यादा सोचती थी और कहती थी कि ‘तुम अब बदल गए हो, पहले जैसे नहीं रहे’।
तुमने कभी इस बात को नहीं सोचा की हो सकता है वो आइने वाली कहानी की बात सच हुई हो।ऐसा हुआ हो की सच में कोई आइने से आदमी निकल कर आया हो और मेरी जगह ले ली हो। शायद ये वजह हो की मैं बदल गया होऊँ। हम हेमशा वहीं सोचते हैं जो हमें अच्छा लगता है या जो हमारे फ़ायदे के लिए होता है या जिससे हमें ख़ुशी मिलती है। एथीयोपिया जैसे देश के किसी शहर में नेगासी नाम का एक छोटा सा बच्चा इतना भूखा है की उसकी पसलियाँ साफ़ साफ़ दिख रही है। क्या हम इस नेगासी नाम के बच्चे के भूख में बारे में सोच सकते हैं। इतनी दूर तक सोचना चाहिए? नज़र से दूर होने के बाद अपने घर के बग़ल में रहने वाले लड़के भी सुदूर कम महत्व वाले देश के लोगों जैसे हो जाते हैं। तुम अब जब कभी कोई सपना देखना तो सपने में मुझे नेगासी नाम से बुलाना।
Feature Image Courtesy: Independent.co.uk

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