खिड़की के शीशे पर वह लड़की ऐसे टिकी हुई थी, जैसे किसी भूले हुए मौसम का आख़िरी पत्ता समय की दीवार से चिपका रह गया हो। बारिश अभी-अभी थमी थी और काँच पर ठहरी हुई बूंदें उसकी आकृति के चारों ओर छोटे-छोटे ग्रहों की तरह चमक रही थीं। मैं कॉफ़ी का अंतिम घूँट पीते हुए उसे देखता रहा। कमरे की पीली रोशनी उसके चेहरे पर उतरकर धीरे-धीरे पिघल रही थी, मानो अँधेरे और उजाले के बीच कोई गुप्त संधि लिखी जा रही हो।

उसकी उँगलियाँ शीशे पर फैली थीं। वे उँगलियाँ नहीं, किसी अदृश्य पियानो की चाबियाँ थीं, जिन पर एक मौन धुन अपनी उँगलियाँ रखे बैठी थी। मुझे लगा, वह शायद मेरी ही कोई खोई हुई धुन है, जो बरसों पहले किसी पुराने गीत की लहरों में बह गई थी और अब लौटकर मेरे सामने खड़ी है। उसकी आँखों में दूर के समुद्रों का रंग था, उन समुद्रों का जिन तक पहुँचने के लिए कोई नक्शा कभी नहीं बनाया गया।

मैंने सोचा, यदि खिड़की खोल दूँ तो क्या होगा। क्या वह किसी भटके हुए पक्षी की तरह रात में विलीन हो जाएगी, या कमरे में आकर उस खाली कुर्सी पर बैठ जाएगी जो बरसों से किसी का इंतज़ार कर रही थी। फिर लगा, शायद वह बाहर खड़ी कोई लड़की नहीं, मेरे भीतर का ही कोई टुकड़ा है, जो काँच की दूसरी तरफ़ जाकर मुझे देख रहा है। हम दोनों एक-दूसरे के प्रतिबिंब थे, दो अलग-अलग अकेलेपन, जो एक ही पारदर्शी दीवार से सटे हुए थे।

बारिश की गंध धीरे-धीरे हवा में घुलने लगी। वह अब भी वहीं थी। उसकी मुस्कान किसी दूरस्थ प्रकाशस्तंभ की तरह थी, दिखाई देती हुई, पर कभी छुई न जा सकने वाली। वह उतनी ही वास्तविक थी जितना कोई पुराना गीत, जिसकी धुन वर्षों बाद अचानक किसी सुनसान शाम में कानों तक पहुँच जाए और भीतर बंद पड़े कमरों के दरवाज़े एक-एक कर खुलने लगें।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

जब दोबारा खोलीं, खिड़की खाली थी।

काँच पर सिर्फ़ मेरी साँस का धुंधला निशान बचा था, जैसे किसी ने अस्तित्व की किताब से एक पूरा अध्याय फाड़ लिया हो और उसकी जगह एक पारदर्शी विराम-चिह्न छोड़ दिया हो।

अरहान (ब्रजेश कुमार सिंह) हिंदी लेखक हैं। उनकी पहली किताब ‘इतवार का एक दिन’ (2025) Amazon और Flipkart पर उपलब्ध है। उनकी कहानियाँ पढ़ने के लिए arahaanblog.com देखें। Instagram, Facebook और X पर मिलें: @arahaan40

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