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खिड़की के शीशे पर वह लड़की: दो अकेलेपन और एक पारदर्शी दीवार

खिड़की के शीशे पर वह लड़की ऐसे टिकी हुई थी, जैसे किसी भूले हुए मौसम का आख़िरी पत्ता समय की दीवार से चिपका रह गया हो। बारिश अभी-अभी थमी थी और काँच पर ठहरी हुई बूंदें उसकी आकृति के चारों ओर छोटे-छोटे ग्रहों की तरह चमक रही थीं। मैं कॉफ़ी का अंतिम घूँट पीते हुए…