बुरा दौर: कोरोनावायरस

बुरा दौर है।
हम सबको बस इस बात का शुक्रगुजार होना चाहिए कि कम से कम हम अभी तक एक सुरक्षित छत के नीचे 3 टाइम का भोजन कर पा रहे हैं।

एक बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला वक़्त ये है। हम बहुत ही व्यापक रूप से बदलने वाले हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से यह समय बहुत कठिन और यातनादायक रहा है। हज़ारो लोग ऐसे होंगे जिन्हें इस बीमारी की वजह से मरने से अंतिम समय मे अपनो का साथ नही मिला होगा। कई परिवार टुकड़ों में इधर-उधर फंसा होगा। कोई माँ-बाप रोजाना शाम को अपने बेटे-बेटी से फोन पर बात करने के बाद और यह जानने के बाद कि वो जहां है सकुशल हैं, चैन से सो नही पा रहे होंगे।

हम घरों में पड़े लोग हर दिन इस आस में टीवी की तरफ नजरे गड़ाए रहते है कि कुछ अच्छी खबर मिलेगी लेकिन हमें दुख और बर्बादी का एक ग्राफ नज़र आता है जो पिछले दिन की तुलना में और ऊंचा दिखाई देता है। इस ग्राफ की ऊंचाई मजबूत से मजबूत इंसान के हौसलों को तोड़ सकती है।

साम्यवाद, समाजवाद सब एकदम टीवी स्क्रीन पर झुंड में पलायन कर रहे मजदूरों के आंखों में साफ साफ देखा जा सकता है। मजदूरों को कम्युनिज्म के बारे में पता नहीं होता है। उन्हें बस रोटी और नेताओं के जुमलों का आकार पता है, जो एकदम गोल होते हैं।

वर्क फ्रॉम होम के नामपर 8 घंटे की जगह 12-14 घण्टे काम करने वाले एम्प्लोयी डरे हुए हैं। उन्हें पता है कि कभी भी एचआर की तरफ से मेल आ सकता है कि अब हमें आपकी जरूरत नहीं। मैं यहां अनआर्गनाइज्ड सेक्टर की बात नहीं कर रहा उसका तो भगवान ही मालिक है। सबको डर है कि साबुन से बार-बार हाथ धोने से कहीं हाथ की लकीरें हीं न मिट जाए।

वो बच्चे जिन्होंने 3-4 साल पहले जन्म लिया उन्हें तो समझ मे ही नही आ रहा कि क्या हो रहा है। वो हंस हंस के अपनी तोतली जुबान में कुछ देर के लिए यह तो बोल रहे है कि मैं कोरोनावायरस को पनिशमेंट दूंगा/दूंगी। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी यह पता चल रहा है कि ये सचमुच कुछ बहुत ज्यादा बुरा है। जोजो किड्स में आने वाले चालाक बंदर से भी ज्यादा बुरा, शेरखान से भी ज्यादा बुरा।

आसमान आजकल पहले से काफी ज्यादा नीला नज़र आता है। रात में अब वो तारे भी दिखने लगे हैं जो पहले नहीं दिखते थे। सुबह-सुबह चिड़ियों का शोर ज्यादा सुनाई देने लगा है। नदियों का पानी साफ हो रहा है। घर की छत से 100 200 किलोमीटर दूर पहाड़ियां भी नज़र आने लगी है। ये सब पहले क्यों नही दिखता था? शायद हम सबने एक ऐसा चश्मा लगाया हुआ था जिसमें धूल की एक मोटी परत चढ़ी हुई थी। शायद किसी ने गुस्से में आकर हमारे चश्मे से ये धूल साफ कर दी है और हमें बताने की कोशिश कर रहा है कि देख, देख दुनिया वास्तव में कैसी होती है।

चंपक की कहानियों में अंत में कहानी के नायक/खलनायक बंटी बंदर, रिंकी लोमड़ी, जैकी सियार को एक सबक मिल जाता था और वो कभी दुबारा कोई गलती नहीं करते थे।

आज रात जब आसमान में तारे गिनने के बाद हम जब अपने अपने कमरों में सोने जाएंगे तब सोने से पहले आखिरी बार आईने या मोबाइल के सेल्फी कैमरे में अपनी शक्ल को देखकर थोड़ा आश्चर्य होगा। हमें अपनी आंखें या चश्मे में जमी धूल को साफ करने के बाद कोई बंटी बंदर, रिंकी लोमड़ी गया जैकी सियार दिखेगा।

Photo: Adil Wahid

अरहान असफल

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