तुम्हारा दुपट्टा आज भी मेरे पास है। दराज़ के एक कोने में दबा हुआ। उसका रंग कभी हल्का नीला था, छोटे-छोटे फूलों से भरा हुआ। अब वे फूल फीके पड़ गए हैं। जैसे समय ने धीरे-धीरे उनका रंग अपने भीतर खींच लिया हो। फिर भी जब मैं उसे निकालता हूँ, तो लगता है जैसे तुमने उसे कल ही अपने कंधे से उतारा था। उसकी तहों में अब भी तुम्हारी देह की कोई बहुत हल्की, लगभग खो चुकी गर्मी बची हुई लगती है।
हमारे घरों के बीच एक छोटी-सी दीवार थी। इतनी छोटी कि हाथ बढ़ाकर दूसरी तरफ रखा जा सकता था। तुम उस पार रहती थीं और मैं इस पार। रात को जब घरों की बत्तियाँ बुझ जातीं और सब सो जाते, हम चुपचाप उसी दीवार के पास आ जाते। हम बहुत कम बोलते थे। ज़्यादातर एक-दूसरे को देखते रहते थे। तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी चुप्पी थी। ऐसी चुप्पी, जिसमें शब्दों से ज़्यादा बातें थीं।
शायद प्रेम की शुरुआत भी ऐसे ही होती है। बिना घोषणा के। बिना किसी बड़े वाक्य के। बस दो लोग होते हैं, एक छोटी-सी दीवार होती है, और उस दीवार के दोनों तरफ एक-एक धड़कता हुआ डर।
उस रात आसमान साफ था। हवा धीमे-धीमे चल रही थी। मैंने दीवार के ऊपर से अपना हाथ बढ़ाया। तुमने अपना दुपट्टा मेरी तरफ कर दिया। मैं उसे उँगलियों से छूने लगा। अँधेरे में उसका रंग साफ दिखाई नहीं दे रहा था, पर कपड़े की बनावट महसूस हो रही थी। जैसे मैं दुपट्टे को नहीं, तुम्हारे होने को छू रहा था। जैसे किसी चीज़ को छूते हुए मैं पहली बार समझ रहा था कि पास होना कितना सुंदर और कितना डरावना होता है।
तभी अचानक एक आवाज़ आई।
वह आवाज़ न बहुत तेज़ थी, न बहुत धीमी। बस अजीब थी। जैसे कहीं दूर कोई पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया हो। या जैसे ज़मीन के नीचे कोई भूला हुआ कुआँ अचानक खुल गया हो। तुम घबरा गईं। तुमने हाथ झटका। दुपट्टा मेरे हाथ में फँस गया और तुम भाग गईं।
तुम्हारे नंगे पाँवों की आवाज़ कुछ देर तक पत्थरों पर सुनाई देती रही। फिर वह गली के मोड़ पर जाकर खो गई। मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ में तुम्हारा दुपट्टा था, पर तुम नहीं थीं। उस पल मुझे लगा, जैसे किसी ने मेरे हाथ में तुम्हारी जगह तुम्हारी अनुपस्थिति रख दी हो।
उसके बाद मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा।
दुपट्टा मेरे पास रह गया। या शायद सच यह है कि मैं उसी दुपट्टे के पास रह गया। अब भी कुछ रातों में, जब घर शांत हो जाता है और अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगती है, मैं उसे दराज़ से निकालता हूँ। देर तक हाथ में लिए बैठा रहता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि उसे फिर उसी दीवार के पास ले जाऊँ और हवा में लहरा दूँ। शायद तुम लौट आओ। शायद तुम अँधेरे से निकलकर फिर सामने खड़ी हो जाओ। जैसे कोई बहुत पुरानी याद अचानक बिना आवाज़ किए लौट आती है।
लेकिन तुम नहीं आतीं।
सिर्फ हवा आती है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि उस रात जो आवाज़ आई थी, वह बाहर से नहीं आई थी। वह मेरे भीतर से आई थी। शायद मैं ही डर गया था। शायद मुझे डर इस बात से लगा था कि तुम सचमुच इतनी पास आ गई थीं। प्रेम दूर हो तो सुरक्षित लगता है। वह कल्पना बना रहता है। कविता बना रहता है। लेकिन जब वह हाथ की पहुँच में आ जाता है, तो आदमी अपनी ही इच्छा से डरने लगता है।
अब तुम्हारे न होने के बाद मेरे पास बस यही दुपट्टा है। कपड़े का एक छोटा-सा टुकड़ा। किसी और के लिए शायद बिल्कुल बेकार। लेकिन मेरे लिए वह एक पूरी रात का बचा हुआ प्रमाण है। वह मुझे याद दिलाता है कि कभी एक दीवार थी। उस दीवार के दोनों ओर हम थे। और एक क्षण ऐसा भी था जब दुनिया बहुत छोटी लगने लगी थी।
फिर एक आवाज़ आई और सब बदल गया।
कभी-कभी सोचता हूँ, दुनिया में ऐसी कितनी दीवारें होंगी। हर दीवार के दूसरी तरफ कोई न कोई खड़ा होगा। कोई हाथ बढ़ा रहा होगा। कोई कुछ कहना चाहता होगा। कोई किसी को छूने ही वाला होगा। और तभी कहीं से कोई आवाज़ आती होगी। लोग डर जाते होंगे। लौट जाते होंगे। अपने-अपने हिस्से की चुप्पी में।
और पीछे रह जाती होगी कोई चीज़।
कभी दुपट्टा। कभी चिट्ठी। कभी कोई अधूरा वाक्य।
ऐसी चीज़, जो अब किसी काम की नहीं होती, फिर भी कोई उसे जीवन भर संभालकर रखता है।
(c) Arahaan

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