मछली

“हम सब पानी में गुम हैं?”
“नहीं, पानी हम सब में गुम है।”
“हम दोनों मछली हैं क्या”?
“हां”।
“पानी तो हममें गुम है! हमें हम में जाना होगा क्या या मर जाना होगा क्या?”
“अब हम मछली से मेढ़क हो गए। हम नहीं मरेंगे”।

“तिकोने आसमान से तुमने क्या मांगा?”
“समोसे। टेढ़े आसमान से तुमने क्या मांगा?
“जलेबी।”
“तुम अचानक से बचपन में क्यों कूदी?”
“मैं अकेले थोड़े कूदी। तुम भी कूदे। हम दोनों पूल से अचानक क्यों कूदे?”
“हम मछली थें।”
“हम मछली थे तो पानी में डूबे क्यों?”
“हम पानी छूकर पत्थर बन गए।”
“वो पानी छूकर देवता कैसे बन गए?”
“चुप। खामोश हो जाओ। नदी खामोश है।”

“नदी जब बोलेगी तो हम बोलेंगे क्या?
मुंह पर चांद रख रो लेंगे क्या?
अपने आंसू से सबकुछ धो लेंगे क्या?
या आंखे एकदूजे की नोच साथ सो लेंगे क्या?
तुम कुछ कहते क्यों नहीं मौन हो क्या?
इतने अलग क्यों लग रहे तुम भी ‘कौन’ हो क्या?”

One response to “मछली”

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