उपन्यास: आँखों में मछलियाँ क्यूँ नहीं तैरती

चैप्टर 1: फिर मिलेंगे

कुछ कहानियों को मैं शराबखानों की मेजों पर बिठाकर शुरू न करूँ तो वो कहीं न कहीं आगे जाकर लड़खड़ाकर गिर सकती है. वो आदमी जो एकदम ऊँचाई से गिरा हो, वो गिरने के नाम से ही डरता है. मैं भी ऐसे ही आदमियों में से एक हूँ। वो चाहें कहानी हो या कोई जीता जागता शख़्स या सड़क पर बिजली का खम्भा, मैं किसी को भी गिरते देखना नहीं चाहता। शायद यही वजह है की मेरी इस कहानी की शुरुआत भी एक शराबखाने से शुरू होती है. शराबखाने से शुरू होने वाली कहानियां कभी बेहोश नहीं होती. वो देर तक आपके शराब में होश बनकर आपके कानों में शहद घोलती रहती हैं.

दोपहर में अमूमन शहर के महँगे बारों में इक्का दुक्का ही लोग होते हैं. वो रविवार कि दोपहरी थी, शायद इसलिए उस दिन बार में अच्छी ख़ासी भीड़ थी. ये बार, उन बारों में से एक था जहाँ लाउड म्यूज़िक नही बजाया जाता था. पूरे बार में मद्धम स्वर में कोई ओपेरा गायिका एक गीत गा रही थी. उसके आवाज़ में कभी कभी अचानक से इतना दुख आ जाता था की बार में अकेले पीने बैठे आशिक़ों, घाटे में चल रहे व्यापारियों और लेखकों के ग्लास एक घूँट में ख़ाली हो जाते थे. मानों जैसे वो उनके ज़िंदगी का आख़िरी ग्लास रहा हो और वो मरने से पहले अपने पसंदीदा ब्राण्ड की शराब चखना चाहते हो. उसने भी उस गायिका के दुःख भरी लय को महसूस करते हुए एक घूँट में व्हिस्की का ग्लास ख़त्म किया था. वो शायद एक लेखक था या आशिक़ या कोई व्यापारी या तीनों हीं.

काँच के उस सुंदर ग्लास में बचे हुए बर्फ़ जितने सुंदर लग रहे थे उतने ही मनहूस भी लग रहे थे. उस ग्लास को देखकर कोई भी नया लेखक अपने डायरी में ये लिख देता की व्हिस्की पीने के बाद ग्लास में बचा बर्फ़ ठीक वैसा ही लग रहा था जैसे प्रेम से सरबोर किसी के हृदय से प्रेम निचोड़ लेने के बाद होता है, सिर्फ़ बर्फ़ ही बच पाती है. हल्की गुलाबी सी बर्फ़.

वो शक्ल और पहनावे दोनों से संभ्रांत घर का जान पड़ता था. उसकी उम्र तक़रीबन 40 साल की होगी. गोरा चेहरा, तराशे गए नैन नक़्श और घनी दाढ़ी। ये जब जवान रहा होगा तब उसकी शक्ल कुँवारी लड़कियों के सपनों में आने वाले लड़कों की तरह होगी. उम्र के इस पड़ाव में भी इसका चेहरा कई जवान लड़कों के दिल में जलन पैदा करने की क़ाबिलियत रखता था. मज़बूत क़द काठी वाले उसके शरीर पर सफ़ेद कुर्ता ऐसे फ़ब रहा था गोया किसी सुंदर अप्सरा ने अपने दुपट्टे से उसके बदन को ढाँक दिया हो. देवताओं की तस्वीरें बनाने वाले पहले कलाकार ने शायद इस जैसे ही किसी शख़्स को देखकर देवताओं की पेंटिंग बनाई होगी. उसके चमकते चेहरे के बीचों बीच दो आँखें इतनी ज़्यादा उदास थी अगर उस बार में कोई कवियित्री मौजूद होती तो एक पुरुष की आँख पर दुनिया की सबसे उदास प्रेम कविता लिख डालती. उसकी भूरी आँखों को देखकर अगर वो कवियित्री अपनी कविता का नाम ‘उदासी का रंग भूरा है’ रखती तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होती.

उस दिन वो काफ़ी समय से बार की उस कुर्सी पर बैठा था. शराब पीने के उसके तरीक़े और बार में आए लोगों से लेकर कुर्सियों तक को बारीकी से देखने के उसके तरीक़े से ये ज़ाहिर हो रहा था की वो शायद किसी का इंतज़ार कर रहा है। उसने अपने होठों पर एक मुस्कान चिपका रखी थी. ये हँसी चिपकी हुई ज़रूर थी पर उस तरह चिपकाई हुई नहीं नज़र आ रही थी जैसे बार में सर्व कर रहे वेटरों ने अपने चेहरों पर चिपकाए थे. उसकी हँसी ऐसी थी जैसे धातु से बने किसी देवता की मूर्ति के मुस्कुराते होठों के छाप किसी काग़ज़ पर उतारकर उसके होठों पर चिपका दिए गए हों या फिर किसी की मुस्कुराहट को किसी ने बर्फ़ की सिल्लियों में क़ैद कर दिया हो. मुस्कुराहटें अच्छे वक़्त के देजा वुओं (Deja Vu) की परछाइयाँ होती हैं. उस दिन उसकी शांत और उदास भूरी आँखें कुछ देर और बार की एक दीवार पर लगी एक लड़की की पेंटिंग को निहारती अगर उसका ध्यान वेटर की आवाज़ से और एक लड़की के चेहरे से भंग नहीं होता.

“दैट्स टेबल नम्बर सिक्स मैम” वेटर ने उसके टेबल की तरफ़ इशारा करते हुए उस लड़की को कहा.
‘थैंक यू” इतना कहकर वो लड़की उसके टेबल की तरफ़ आयी और उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी.

उसने आज 10 साल बाद उसको देखा था. उस शख़्स को सामने देख लेना जिसे देखने के लिए दस सालों तक की तैयारियाँ की गयी हो, घर के अक्वेरीयम में यूनीकॉर्न को तैरते देख लेने से कम नही होगा. वो इंसान जिसका किसी ज़माने में एक पल के लिए आँखों से दूर होना दोज़ख़ का अहसास दिलाता हो वो शख़्स जब एक लम्बे समय के बाद आँखों के सामने दिखे तो मन के भीतर क्या टूटता बिखरता संवरता है वो बस वही जानता है जो दस साल दोज़ख़ सरीखी इंतज़ार की आग में तपता है. इतने सालों के बाद लड़की को देखने के बाद लड़के को लगा था की कुछ बहुत अजीब सा हो जाएगा. दस साल की बेचैनी न जाने कैसा रंग अख़्तियार करेगी वो ये सोच के ही डर गया था. उसे यक़ीन था की उसे देखने के बाद वो एकाएक ज़ोर से चिल्लाएगा की कहाँ थी तुम, क्यूँ चली गयी थी? या फिर बिना कुछ कहें एक थप्पड़ उसके गालों पर धरने के बाद उस से लिपट कर रोने लगेगा. हालाँकि उम्र और वक़्त ने उसके मन को इस तरह ढाल दिया था की उसने अपनी सारी बेचैनियाँ, सारी संवेदनाएँ, शिकायतें, ग़ुस्सा, नफ़रत, प्यार सबको क़ाबू में कर लिया. उसका न बिखरना ठीक वैसा ही था जैसे किसी वैज्ञानिक द्वारा यह उम्मीद करना की उसके द्वारा चौकौर आकार के किसी धातु का एक नए तरह के द्रव में डालने से एक ऐसा नूक्लीअर रीऐक्शन होगा की तबाही मचेगी लेकिन यह नतीजा निकलना की उसने चाय में बिस्कुट डुबोयी थी और बिस्कुट कुछ देर स्थिर रहने के बाद चाय में टूट कर गिर गया.

वो जब अकेला था तब उसे बार का माहौल हल्का हल्का सा लग रहा था लेकिन लड़की के उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठते ही सबकुछ भारी सा हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उस जगह की हवा में कुछ गाढ़ा सा मिला दिया हो. किसी ने कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर कुछ बटन दबाकर उस बार में हो रही सभी क्रियाओं को थोड़ा धीमा कर दिया हो. वो दोनों कुछ देर के लिए यूँ हीं शांत बैठे रह जाते अगर वेटर आकर यह नहीं पूछता की वो क्या ऑर्डर करेंगे.

उसने एक कोककटेल, एक मॉकटेल और खाने के लिए सीज़र सीज़र सलाद का ऑर्डर दे दिया.
‘हाय, कैसी हो” लड़के ने लम्बे समय की ख़ामोशी को बेहद ही औपचारिक ढंग से तोड़ते हुए कहा.
“ठीक हूँ, तुम कैसे हो” लड़की ने ऐसे जवाब दिया जैसे वो लड़के से दूसरी या तीसरी बार ही मिली हो.
लड़का चाहता था की वो इस सवाल का जवाब दे कि “जैसे छोड़कर गयी थी, वैसा ही हूँ बास थोड़ा बूढ़ा हो गया हूँ.” लेकिन उसने धीरे से टिश्यू पेपर के एक टुकड़े को अंगुलियों से गोल करते हुए कहा “मैं भी ठीक हूँ.”

दस साल। पूरे दस साल बाद वो उसे दुबारा मिली थी. वही गोल-गोल मोटी मोटी बिल्लियों जैसी आँखें, नशे में धुत्त नागों जैसे नाचते घुंघराले बाल, ओस में खिले गुलाबों जैसे हल्के गुलाबी होंठ और इन्हीं होठों के उपर अरसो से क़त्ल करने वाला वो तिल. ऐसा दूसरी बार था जब उसने उसे साड़ी में देखा था. हल्के हरी साड़ी और गहरे हरे रंग के सलीवलेस ब्लाउज़ में हरियाली की देवी लग रही थी. पहले से थोड़ी पतली हो गयी थी और वक़्त की कुचियों ने उसके चेहरे की रंगत को शायद और ज़्यादा निखार दिया था. उन दोनों को साथ बैठे अगर कोई फंतासी कहानियाँ लिखने वाला लेखक देख लेता तो उसके दिमाग़ में देवलोक से भागकर मृत्यलोक में छिप कर मिलने वाले देवी-देवताओं की प्रेम कहानी का प्लॉट ज़रूर बन गया होता.

“अबतक तुम्हारे सारे उपन्यास पढ़ लिए मैंने. वो अभी हाल में जो तुमने लिखी है न उस बूढ़े चित्रकार और उसके मॉडल की प्रेम कहानी. काफी अच्छी है. तुमने लेकिन उस कहानी में उस मॉडल को मार क्यूँ दिया. तुम्हें उसे नहीं मारना चाहिए था. तुम्हारी आदत गयी नहीं अबतक. तुम अब भी कहानियों में लड़कियों को मार डालते हो.”

“कहानियों में किसी को गला घोंटकर एक बार में मार देना और किसी को हकीकत में हर पल हर क्षण मुर्दा बनाते रहना. इन दोनों में से कौन ज्यादा भयानक है? अगर तुम्हे उत्तर पता है तो समझ जाओ कि क्या वजह है कि मैं कहानियों में लड़कियों को क्यूँ मार डालता हूँ. कहानियों में की गयी हत्याएं वो हत्याएं होती हैं जो शायद हकीकत में होने वाली होती हैं पर होती नहीं. कलम चलाने वाले लोग हथियारों से भी ह्त्या करने की जगह कहानियां या कवितायेँ हीं लिखना पसंद करते हैं”.

“तुम बिलकुल भी नहीं बदले. तुम्हारी बातें. तुम्हारी सोच. तुम्हारे फलसफे सब के सब वैसे ही है जैसे पहले थे. क्या तुम अब भी वैसे ही शराब पीते हो? क्या अब भी वैसे ही शराब पीकर तुम रोते हो गिरते हो?”

“नहीं. पहले शराब मुझे पीती थी. अब मैं शराब को पीता हूँ. काफी अंतर है अब.” इतना कहकर वो सेक्स ओन द बीच के स्वाद को अपने होठों पर उड़ेलने लगा.

सामने बैठी वो औरत उसे देखने लगी. जैसे वो इस मुलाक़ात के हर हिस्से में उसे पूरे दस सालों के लिए देख लेना चाहती हो. वो उसे जिन नज़रों से देख रही थी शायद उन्हीं देखने के उन्हीं तरीकों की वजह से लड़कियों को लिखने वाले लोग पहेली की उपमा देते हैं. उसके देखने में काफी प्रेम था. वैसा प्रेम जो सालों बाद उत्खनन के दौरान किसी प्राचीन सभ्यता के अवशेषों सा बाहर चला आता है. ऐतिहासिक, रहस्यमयी, उलझा हुआ लेकिन काफी अजीज. सहेजकर सालों तक रखे जाने जैसा. औरत जब लड़की थी तब उसने इसे ऐसे कभी नहीं देखा था. लड़कियों और औरतों में शायद देखने का भी फर्क होता हो. एक दफा मेरी प्रेमिका काफी सालों बाद औरत के रूप में मिली तब उसने मुझे देखते हुए अपनी नजरें झुका ली थी और अपने पति को देखकर बेवजह मुस्कुराने लगी थी. वो बताना चाहती थी की देखो मैं इतनी खुश तुम्हारे साथ नहीं हो सकती थी. इसलिए मैंने तुम्हें छोड़ा. वो शायद बताना चाह रही थी कि लडकियां बस अपने प्रेमियों को अपनी ख़ुशी की वजह से छोड़ देती हैं. मैंने भी उस दिन अपनी मुस्कुराहट से बताया था कि देखो मुझे मुस्कुराने के लिए आज भी किसी का साथ नहीं चाहिए. किसी का भी नहीं.

वो दोनों बहुत देर तक खामोश रहें. इतने खामोश कि वो दोनों अपनी अपनी खामोशियों पर चिलालाते हुए सुने जा सकते थे. बहुत देर की ख़ामोशी को उसने ठीक वैसे तोड़ने की कोशिश की जैसे तकनीकी के दौर में लड़कियां उनसे प्यार करने वाले लड़कों को व्हाट्सएप पर ब्लाक कर उनका दिल तोड़ने की कोशिश करती थी. खामोशी टूटने की चटकती हुई दस साल पुरानी आवाज औरत ने अपने कानों में महसूस की. उन कानों में जहाँ दस साल पहले इस लड़के के गिफ्ट हुए सस्ते लेकिन सुन्दर झुमके खामोशी से भी महीन आवाज में गाना गाते थे.

“जब मेरा एक्सीडेंट हो गया था और मैंने तुम्हें कई बार बुलाया था कि मुझसे मिल लो एक आखिरी बार देख लो. तब तुम आई क्यूँ नहीं थी. एक बार देख लेती मुझे.” उसने थोड़ी भर्राती सी आवाज में कहा. ऐसी भर्राई आवाजों के नीचे पानी का एक गहरा सैलाब बहता है. अगर कोई इस आवाज की सतह पर हलकी सी चोट करे तो शायद दुनिया एक बार फिर से पानी में डूब जाए. लड़की ने उसकी इस भर्राई आवाज को महसूस किया लेकिन कोई चोट नहीं कि वो चुप रही. उसकी चुप्पी में एक ऐसी लड़की का चित्र था जो घर के अलमीरा में घंटो से वजह नामक एक दस्तावेज ढूंढ ढूंढ कर खीज रही हो.

लड़की की चुप्पी लड़के ने भांप ली थी. उसने शायद उसे अलमीरा में वजह नामक दस्तावेज ढूंढते हुए देख लिया था. लड़के ने अलमीरा के बगल वाले टेबल पर पानी का गिलास बनते हुए फिर से कहा “एक बात बताऊं!”

लड़की ने चेहरे पर बुझी हुई प्यास जैसी शान्ति लाते हुए कहा “हाँ बताओ”

लड़के ने अपने बालों पर हाथ फिराते हुए एक कटे का लंबा निशान दिखाया. “तुम्हें पता है अगर तुम मुझसे मिलने आ जाती तो शायद यह निशान गायब हो जाता. लेकिन शायद यह निशान अबतक मेरे माथे पर इसलिए भी है ताकि तुम देख पाओ कि अपने माथे पर अनदेखा किये जाने का निशान लेकर चलना कितना भारी होता है.”

लड़की अगर अभी पूरी तरह लड़की होती थोड़ी सी भी औरत नहीं होती तो शायद वो बहुत जोर से चलाकर रो रही होती और लड़के की हथेलियों में अपना सर रख दिया होता. लेकिन वो अब 24 साल की लड़की नहीं थी. उसने जींस टॉप नहीं पहना था. वो कॉलेज में नहीं पढ़ा करती थी. वो अब बातों बातों में ‘ओ मेरा बेबी’ कहना शायद भूल गयी थी. वो औरत होने के बहुत भारी भारीपन को अपने कंधे पर उठाकर खड़ी होकर लड़के को चूम नहीं सकती थी इसलिए उसने सामने रखे मोकटेल की जगह लड़के की झूठी गिलास से एक घूँट शराब पी ली. उसने औरत होने के बावजूद अपने अन्दर इतनी सी लड़की बचा कर रखी थी जैसे हम सब अपने अपने जेहन के किसी कोने में हलका सा गिल्ट छिपाकर रखते हैं.

सालों बाद विलुप्त नदियाँ जब अचानक से आस्तित्व में आती है तो बहने से पहले उस समंदर का नक्शा ढूंढती हैं जहाँ उन्हें फिर से शामिल हो जाना है. उस लड़की को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि लड़के से मिलने के बाद उसकी भूमिका भी ऐसी ही किसी नदी जैसी हो जायेगी. लड़के को भी अंदाजा नहीं था की वो इतने सालों बाद लड़की की मोटी मोटी बिल्लियों जैसी आँखों में डूबकर समययात्री बन जाएगा. लड़का अपने आने वाले उपन्यास में एक समययात्री की आत्मकथा ही लिख रहा था. उसे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि लड़की के साथ यह मुलाक़ात उसे भी एक समययात्री बना देगी. वो फिर से दस साल पहले लौटने लगेगा. पीले कनेर के फूलों पर मुहब्बत के हसीं सपनों का चित्र बनाने लगेगा. गुलाबी दुपट्टों में उलझकर ब्रह्माण्ड के सबसे सुन्दर ग्रह की खोज कर लेगा. एक बहुत ही टुच्ची लेकिन काफी सच्ची फिलोसोफी है. सच्चा और करारा वाला इश्क बस एक बार होता है. बाद में तो हम प्यार का रफ कर रहे होते या फिर फेयर.

वो दोनों उस दिन अगर वहां कुछ देर और रुक जाते तो शायद हो सकता था दोनों या दोनों में से कोई एक समय के पीछे बहुत गहरे तक गिरने लगता. जैसे हम कभी कभी अपनी आँखें बंद करते हैं तो हमें दिखाई देता है की हम पीले और काले डॉट्स के एक बहुत ही अथाह गहराई में गिरते जा रहे हैं. वो दोनों भी शायद ऐसे ही किसी गहराई में गिरने लगते अगर लड़के ने ऐन मौके पर यह नहीं कहा होता कि “दिव्यंका, अब मुझे जाना चाहिए. आज मेरी एक जरुरी मीटिंग थी अपने पब्लिशर से.”
“हाँ, मुझे भी आज अपने वकील से मिलना था. शेखर के प्रॉपर्टीज का मसला था. मुझे भी चलना चाहिए”.

वो दोनों झूठ कह रहे थे और ये बात दोनों को पता थी. दोनों को यह भी पता था की वो ज्यादा देर साथ में रहें तो अपनी ही बीती जिंदगी के किसी कोने में लैंड कर जायेंगे. जैसे कभी कभी रात के घने अँधेरे में आसमान से उड़नतश्तरियां जमीन पर उतरती हैं.

“अपना ख्याल रखना, अभिराम.” लड़के के मोबाइल पर एक बहुत जाने पहचाने नंबर से व्हाट्सएप सन्देश आया. मैसेज के ऊपर एंजेल लिखा था. लड़के ने एक बार मैसेज और एक बार लड़की के चेहरे को देखते हुए कहा “दस साल लग गये तुम्हें मुझे अनब्लाक करने में.” किसी काल्पनिक दुनिया में एक मशीन हैं जिस मशीन में देखते हुए आप रोते हैं तो चेहरे पर खिली खिली सी प्यारी मुस्कान आ जाती है. अभिराम की बार सुनकर दिव्यंका के चेहरे पर भी वही मुस्कान आई. वो मुस्कान जिसके अन्दर शायद दस साल तक का रोना छिपा था.

“हमेशा मुस्कुराती रहना, हम फिर मिलेंगे और हाँ हरी साड़ी में एकदम से प्रकृति की देवी जैसी लगती हो. मेरे हिस्से में ऐसे ही सावन बनकर आते रहने”. अभिराम ने अपनी दस साल पुरानी एंजेल के मैसेज का रिप्लाई किया. दिव्यंका मुस्कुराई. वो शायद एंजेल बनने की ख़ुशी में मुस्कुरा रही थी. जाने से पहले वो काफी देर तक इस बात पर लड़ते रहें की बिल मैं दूंगा, बिल मैं दूँगी. बाद में यह तय किया गया कि अभिराम बिल देगा और बिल जितने की रकम दिव्यंका बाहर सड़क पर दिखने वाले किसी जरुरतमन्द को दे देगी. अभिराम की यही आदत सबसे प्यारी लगती थी दिव्यंका को. अभिराम के अन्दर काफी प्रेम था सभी के लिए. अभिराम उन लोगों में से एक था जो अपने जेब का आखिरी दस का नोट किसी भूखे बच्चे को देकर 10 किलोमीटर पैदल चल लेता था.

दिव्यंका अपनी गाड़ी में बैठ चुकी थी. यह वो समय था जब लोग जा रही हूँ जा रहा हूँ कहने के बाद भी काफी देर तक रुके रह जाते हैं. ढेर सारी प्रेमकहानियां तो वक्त के इसी ठहराव में कालजयी हो जाती हैं. “अब मैं जाती हूँ, ख्याल रखना. फिर मिलूंगी तुमसे. बहुत कुछ है जो तुम्हें बताना है. बहुत कुछ है जो तुमसे सुनना है.”

“तुम भी अपना ख्याल रखना.” अभिराम ने धीमी और प्यार सी आवाज में कहा. उसके इतने कहने के कुछ देर बाद दिव्यंका के गाडी का इंजन शोर करने लगा जैसे वो भी कहना चाहता हो फिर मिलेंगे. दिव्यंका अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर पीछे मुड़कर अभिराम को तबतक देखते रही जबतक अभिराम नजरों से ओझल नहीं हो गया. अभिराम भी दिव्यंका के जाने के बाद सड़क पर यूँ ही खड़ा एकटक देखता रहा. जैसे उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो दस साल बाद आज फिर से एकबार दिव्यंका से मिला. वो दिव्यंका जिसने दस साल पहले अपने आखिरी वौइस् नोट में कहा था “मैं मर जाना पसंद करुँगी पर तुम्हारा चेहरा कभी नहीं देखूंगी.” वक्त हमेशा बुरे ढंग से करवट नहीं लेता. कभी कभी वक्त भी अपने बुरे सपने से खीजकर उठता है तो उठकर गीली ओंस से सनी घासों पर टहलना चाहता है. बहुत कुछ जो बुरा हुआ है उसको ठीक कर देना चाहता है.

क्रमशः

भाग 2 शीघ्र

11 responses to “उपन्यास: आँखों में मछलियाँ क्यूँ नहीं तैरती”

  1. पढ़ने वाला एक नदी की बहाव के तरह पढ़ते रह जाएगा| अब दूसरे पार्ट का इंतजार करना मतलब एक नदी का पहाड़ पार करने जैसा है|

    1. पढ़ने के लिए शुक्रिया मानसी। अगला हिस्सा जल्द ही।

  2. क्या ही कहूँ अरहान……मेरा कहना अब छूट गया है वरना कहता कि जितना पैना जीवन तुम जी रहे हो उसमे अपने ही लहू से रोज़ अभिषेक होता है…..मुझे डर है कि जब सारी दुनिया तुम्हारा यशगान कर रही हो तब तक सारा लहू रिस न जाये।

  3. बहुत बहुत शुक्रिया दोस्त.

  4. पहला ही भाग पढ़कर बहुत अच्छा लगा
    ऐसा लगा जैसै सब नज़रों के सामने ही चल रहा हो
    पढ़ते पढ़ते ऐसा लग रहा था मानो कहानी के एक एक शब्द की गहराई में डूबते जा रहे हों
    अगले भाग का इन्तज़ार रहेगा❤️❤️

    1. पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया अगला भाग बहुत जल्द।

  5. लिखना बंद ना कीजिएगा कभी

    1. पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया मित्र. जहाँ तक मुझे लगता है लिखना जल्दी छूटेगा नहीं बाकी गारंटी तो किसी चीज की नहीं.

  6. हैलो अरहान भाई। मैं सुरिंदर उर्फ सूरी । वही जिसने एक दफा आप से अपने upsc और प्यार के बारे में बात किया था और अपने उसे 2 पैराग्राफ लंबा जवाब भी भेजा था।
    बस इतना ही कहूंगा अरहान भाई कि लिखते रहना.. आपको पढ़कर मुझे जैसा लगता है शायद वो फीलिंग मैं बयां नही कर सकता। समझ नही आ रहा और क्या लिखूं ,मुझे अधिक लिखना नही आता पर आप लिखते रहना बस। बहोत आगे जाओगे आप अरहान सर, भगवान खुश रखे आपको।

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