उसी पुरानी कुर्सी पर: बारिश, चिट्ठी और अनुपस्थिति का शांत स्वागत

मैं आज भी उसी पुरानी कुर्सी पर बैठता हूँ, जिस पर कभी तुम बैठा करती थीं। कुर्सी अब भी वैसी ही है, पर उस पर तुम्हारे अस्तित्व का भार नहीं रहा। बारिश की आवाज़ सुनते ही मुझे याद आता है कि तुम भीगने से डरती थीं, फिर भी मेरे साथ बारिश में ठहर जाना तुम्हें अच्छा लगता था। मैं तुम्हें छाता थमा देता और तुम हँस पड़तीं। अब जब बारिश आती है, मैं अकेला भीगता हूँ, और उस हँसी की जगह केवल पानी की आवाज़ रह जाती है।

तुम्हारी वह आख़िरी चिट्ठी आज भी मेरे पास सुरक्षित है। मैंने उसे न जाने कितनी बार पढ़ा है, पर हर बार उसके शब्दों में कोई नया अर्थ खुल जाता है। शायद इसलिए कि हर बार उसे पढ़ने वाला मनुष्य वही नहीं होता। प्रेम खो देने के बाद हम अपने पुराने रूप में नहीं रहते। हम धीरे-धीरे बदल जाते हैं, जैसे किसी पुरानी तस्वीर के रंग समय की धूप में फीके पड़ते जाते हैं।

मैंने कभी सोचा था कि समय सब कुछ ठीक कर देगा। अब समझता हूँ कि समय का काम मरहम लगाना नहीं, केवल आगे बढ़ते रहना है। वह घावों को भरता नहीं, उन्हें स्मृतियों की गहराई में उतार देता है। आज मैं उन क्षणों को सबसे अधिक याद करता हूँ जो कभी साधारण और महत्वहीन प्रतीत होते थे। तुम्हारा चाय में चीनी कम डालना, मेरा लिखते समय अनायास मेरे बालों को छू देना, आधी रात को उठकर पानी पीना। वे छोटी-छोटी आदतें अब मेरी अपनी आदतों में बदल चुकी हैं, मानो तुम्हारी अनुपस्थिति ने उन्हें मेरे भीतर स्थायी निवास दे दिया हो।

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मैं भी तुम्हारी स्मृतियों के किसी शांत कोने में अब भी बैठा हूँ? क्या तुम्हें भी कभी यह ख़याल आता है कि यदि हम थोड़ा और धैर्य रखते, थोड़ा और एक-दूसरे को समझ पाते, तो हमारी कहानी का अंत कुछ और होता? इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। मैं केवल इतना जानता हूँ कि प्रेम और वियोग दोनों मेरे भीतर साथ-साथ निवास करते हैं। एक मुझे जीवन से बाँधे रखता है, दूसरा हर दिन मुझसे कुछ न कुछ छीन लेता है।

शाम धीरे-धीरे उतर रही है। मैं खिड़की बंद कर रहा हूँ। कल बारिश होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानता। पर इतना निश्चित है कि तुम्हारी अनुपस्थिति फिर आएगी, हमेशा की तरह। और मैं उसे उसी शांत स्वीकृति के साथ अपने भीतर जगह दे दूँगा, जिस तरह कभी हमने एक-दूसरे को स्वीकार किया था; बिना किसी शर्त के, बिना किसी वादे के, केवल प्रेम के भरोसे।

अरहान (ब्रजेश कुमार सिंह) हिंदी लेखक हैं। उनकी पहली किताब ‘इतवार का एक दिन’ (2025) Amazon और Flipkart पर उपलब्ध है। उनकी कहानियाँ पढ़ने के लिए arahaanblog.com देखें। Instagram, Facebook और X पर मिलें: @arahaan40

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