टैग: स्मृतियाँ
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उसी पुरानी कुर्सी पर: बारिश, चिट्ठी और अनुपस्थिति का शांत स्वागत

मैं आज भी उसी पुरानी कुर्सी पर बैठता हूँ, जिस पर कभी तुम बैठा करती थीं… बारिश की आवाज़ सुनते ही मुझे याद आता है कि तुम भीगने से डरती थीं, फिर भी मेरे साथ बारिश में ठहर जाना तुम्हें अच्छा लगता था। आज जब बारिश आती है, मैं अकेला भीगता हूँ।
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शब्द कागज़ पर टिक नहीं रहे: बारिश, स्मृतियाँ और एक अधूरी कहानी

बारिश लगातार हो रही है। खिड़की के पार की दुनिया धुंधली पड़ गई है… मैं लिखता हूँ कि कहानी का नायक भीगता हुआ सड़क पार कर रहा है। तभी स्याही की एक बूंद कागज़ पर गिरती है और फैलते-फैलते उसके चेहरे का आकार लेने लगती है। और मैं सोचता हूँ कि शायद असली कहानियाँ वही…