टैग: कविता
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तू समझ या ना समझ
तू समझ या ना समझअब सबकुछ मैं तेरी समझदारी पर छोड़ता हूँदुश्मनों की तादाद बढ़ रही है मेरी दुनियां मेंअब सबकुछ मैं अपना तेरी यारी पर छोड़ता हूँचोट खाया है हमने मजबूत बनने की हर कोशिश परअब सबकुछ मैं अपना, अपनी लाचारी पर छोड़ता हूँमर्ज बढ़ता ही जा रहा है, तीमारदारों की तीमारदारी सेअब सबकुछ…
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यादें
जिन्दा हैं जेहन में अबतक वो यादेंअबतक वो कहानियांपहलु में जिनके बीता अपना बचपन, अपनी जवानियाँवो झांकती आँखों वाली खुली खिड़कियाँचाट पर टहलती मोहल्ले की लड़कियांवो भेजना हमारा ख़त उनकोऔर मिटा देना सारी निशानियाँजिन्दा है जेहन में अबतक वो यादें,अब तक वो कहानियांवो दांतों तले ऊँगली दबाकर उसका मुस्कुरानाकागज़ के टुकड़े फेंककर प्यार जतानावो उसके बाहीं में बीते पालो…
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डर
डर बचपन से सिखाया गया था उसे किसी से नहीं डरना है किसी से भी नहीं डरना है किस हालत में नहीं डरना है किसी हथियार से नहीं डरना है वो निर्भीक बना किसी से ना डरा आगे बढ़ता रहा फिर एक दिन उसे प्रेम हुआ और उस दिन के बाद से वो डरने लगा …
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एक शाम
एक शाम जब दिन ले रही थी उबासी और रात कर रही थी जागने की तैयारी परिंदे लौट रहे थे घर को चुने हुए दानों के साथ पनिहारिनों की टोली लौट रही थी हाथों में मटके लिए पूर्व हवा के झोकों के बीच सूरज ले रहा था झपकी वो शाम लौट आने की शाम थी सब कोई लौट रहे थे वापस अपने घर…
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बदलाव
उनकी नजरो के जबसे हैं शिकार बने तबसे मर्ज-ए -मोहब्बत में हैं बीमार बने वो पलट के पूछते भी नहीं हाल हमारा हम ही मरीज और हम ही तीमारदार बने हंटर चला देती हैं हम पर इनके जैसी शोख हसीनाएं बेशर्म हम हैं जो इन जैसो के आशिक हर बार बने जबसे शौक़ चढ़ा है उनको…
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वापसी
लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली मेंजहाँ वर्षों से मेरे इंतज़ार में खड़ा है एक खंडहरनुमा घरअपनी खिड़कियों में कुछ बेचैन आँखों को टाँके हुएअपनी दरकती दीवारों में टूटने का सबब सँभाले हुए लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली मेंमैं लौट जाना चाहता हूँ फिर से उसी घर मेंजिसके…
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आजादी
हमलोग जेल की दीवारों पर लिखते रहे खून से आजादी की कवितायेँ जेल के रोशनदान से भेजते रहे आजाद हवाओ को प्रेमपत्र हाथो में जडी लोहे की बेड़ियों से भी की हमने अपने आजाद दिनों की बाते दीवाल पर रेंगती छिपकलियों को भी हमने बताया की 6X 8 के इस तंग कमरे में भी ढूंढा जा सकता…
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मेरे रात का एक हिस्सा
कभी तुम चुपके से चुरा लेनामेरी रात का एक टुकडाऔर सो जाना मेरे रात के हिस्से मेंतुम्हे पता चलेगा कीचाँद के लाख चमकने के बावजूद भीमेरी रातें कितनी अँधेरी हैंचैनो सुकून के सारे साजो सामान के बावजूद भीकितनी बेचैनी है मेरे रातों मेंतुम्हे पता चलेगा कीक्यों मेरी चुप्पीजलती है मेरी डायरी मेंक्यूँ तुम्हारी बाते आते…
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सृजन
मुझे नहीं पता है भौतिकी के सिद्धांतो के बारे में ना ही मुझे विज्ञान की थोड़ी सी भी समझ है ना ही मैं न्यूटन हूँ ना ही आइंस्टीन फिर पर फिर भी मैं अपने छोटे से तंग अँधेरे कमरे में तुम्हारे जुल्फों से रात बना सकता हूँ तुम्हारे चेहरे से चाँद बना सकता हूँ तुम्हारी…
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कोई था
Photo Courtsey: Tumblr.com कोई था जो हमारी शामें गुलजार किया करता था कोई था जो दरिया किनारे हमारा इंतज़ार किया करता था कोई था जो हम पे अपनी जान भी निसार करता था कोई था जो हम से भी प्यार करता था कोई था जिसके आने से ख़ुशी लौट आती थी कोई था जिसके जाने से आँखें नम हो…