श्रेणी: लेखनी
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शब्द कागज़ पर टिक नहीं रहे: बारिश, स्मृतियाँ और एक अधूरी कहानी

बारिश लगातार हो रही है। खिड़की के पार की दुनिया धुंधली पड़ गई है… मैं लिखता हूँ कि कहानी का नायक भीगता हुआ सड़क पार कर रहा है। तभी स्याही की एक बूंद कागज़ पर गिरती है और फैलते-फैलते उसके चेहरे का आकार लेने लगती है। और मैं सोचता हूँ कि शायद असली कहानियाँ वही…
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लेखक बनते है धीरे धीरे

मुझे याद है वो रात जब मैंने पहली बार कुछ लिखा था और सोचा था कि शायद यही है। शायद यही वो चीज़ है जो मुझे करनी है। लिखा क्या था? कुछ खास नहीं। कुछ लाइनें थीं, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी, थोड़ी कच्ची। लेकिन उन्हें लिखते वक्त जो महसूस हुआ था, वो एक अजीब-सी राहत थी। जैसे…
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इंतियाज अली को खत

प्रिय इम्तियाज़ सर, आपको ख़त लिखना, मानो उस रेल की खिड़की से बाहर झाँकना है जहाँ से ज़िंदगी की सबसे हसीन कहानियाँ दिखती हैं। जब पहली बार “सोचा ना था” देखी तो लगा जैसे कोई दोस्त मिल गया हो, जो बिना किसी फ़िल्टर के अपनी कहानी कह रहा हो। आपकी हर फ़िल्म में वो सच्चाई…